धर्मनगरी हरिद्वार में ब्रिटिश काल के दौर में वर्ष 1842 में ऊपरी गंग नहर की योजना बनी थी. तत्कालीन ब्रिटिश इंजीनियर सर प्रोबी थॉमस कॉटले ने हरिद्वार से कानपुर देहात तक सिंचाई व्यवस्था को सुचारू करने के लिए इस नहर की खुदाई करने की योजना बनाई थी. करीब 12 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद सन 1854 में यह नहर खुदकर तैयार हुई थी जिसका उद्घाटन तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी द्वारा किया गया था. इस महापरियोजना में शहर के कई ऐतिहासिक संपर्क पुलों का निर्माण भी कराया गया था.

हरिद्वार में पौने दो सौ साल पहले ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बना ऐतिहासिक ‘ललतारव पुल’ आज भी इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है. 172 वर्षों के लंबे सफर, मौसम की मार और भारी यातायात के थपेड़ों को झेलने के बाद अब यह प्राचीन धरोहर जर्जर स्थिति में पहुंच चुकी है. सुरक्षा के मद्देनजर सिंचाई विभाग ने इस पर भारी वाहनों की आवाजाही पूरी तरह रोक दी है, ताकि ब्रिटिश काल की इस अमूल्य विरासत को सुरक्षित रखा जा सके.

चंडी चौक से हरिद्वार शहर के अंदर प्रवेश करते समय ललतारव पुल इसी ऐतिहासिक शृंखला का एक प्रमुख हिस्सा है. अंग्रेजों के जमाने में निर्मित यह मेहराबदार पुल चूने, सुर्खी और पक्की लाल ईंटों के बेजोड़ गारे से बनाया गया था. पौने दो सौ साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह पुल आज के आधुनिक कंक्रीट पुलों के सामने पूरी मजबूती के साथ सीना तानकर खड़ा है और अपनी बेजोड़ मजबूती का परिचय दे रहा है.
वर्तमान वर्ष तक अपने निर्माण के 172 गौरवशाली वर्ष पूरे कर चुका यह ऐतिहासिक पुल अब उम्र के तकाजे के कारण जर्जर स्थिति में है. लगातार कई दशकों तक चले भारी यातायात के दबाव और मौसम के थपेड़ों ने इसकी प्राचीन संरचना को कमजोर किया है. हरिद्वार की ऊपरी गंग नहर और उसके तटों पर आवागमन को सुचारू करने के लिए बने पुलों का यह ढांचा उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के नियंत्रण में आता है जिसकी सुरक्षा व्यवस्था पर विभाग लगातार नजर बनाए हुए है.
शहर में यातायात का दबाव बढ़ने और इस प्राचीन ढांचे पर भार कम करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा कुछ वर्ष पूर्व ही इसके समानांतर एक नया वैकल्पिक पुल तैयार कराया गया था. नए पुल के बनने से शहर के अंदर आने वाले भारी वाहनों को सुगम रास्ता मिल गया. इस नए निर्माण से पुराने पुल को एक बड़ा सुरक्षा कवच मिला जिससे 172 साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर पर पड़ने वाला भारी दबाव काफी हद तक नियंत्रित हुआ
पुल की जर्जर हालत को देखते हुए उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने इस पुल के एक छोर पर चेतावनी का साइन बोर्ड लगा दिया है. विभाग ने इस पुल के ऊपर से भारी वाहनों के आवागमन को पूर्ण रूप से बंद कर दिया है. वर्तमान में ललतारव पुल के ऊपर से केवल मोटरसाइकिल, ऑटो, कार और पैदल यात्रियों को ही सावधानीपूर्वक गुजरने की अनुमति दी गई है ताकि किसी भी खतरे या दुर्घटना से पूरी तरह सुरक्षित रहा जा सके.
मनोज कुमार, क्यूरेटर, पुरातत्व संग्रहालय, गुरुकुल कांगड़ी समविश्वविद्यालय हरिद्वार बताते हैं कि आम बोलचाल में ललतारव कहा जाने वाला यह पुल दरअसल शुद्ध रूप से ललिता राव पुल के नाम से जाना जाता है. वे बताते हैं कि चंडी चौक की तरफ से इस पुल को पार कर शहर में प्रवेश करते ही पोस्ट ऑफिस के बराबर से पहाड़ के किनारे जाने वाले रास्ते पर करीब दो सौ मीटर आगे बाईं तरफ मां ललिता देवी का एक छोटा सा प्राचीन मंदिर है. इसी पावन मंदिर के कारण इस ऐतिहासिक पुल का नामकरण हुआ था.

इतिहासकार मनोज कुमार बताते हैं कि सन 1854 में चूना सुर्खी से बनी यह ब्रिटिश कालीन वास्तुकला आज भी इंजीनियरिंग का एक हैरतअंगेज चमत्कार है. आधुनिक दौर के आरसीसी पुलों की तुलना में यह 172 साल पुराना ढांचा अपनी विशेष बनावट और पारंपरिक निर्माण सामग्री की बदौलत आज भी सीना ताने खड़ा है. हालांकि लंबे समय तक भारी वजन सहन करने के कारण अब इसकी आंतरिक बनावट काफी कमजोर नजर आ रही है जिसके चलते भारी वाहनों पर रोक लगाना एक शानदार कदम है.
इतिहासकार मनोज कुमार आगे बताते हैं कि ललिता राव पुल केवल एक संपर्क मार्ग नहीं बल्कि हरिद्वार के स्वर्णिम विकास और ब्रिटिश कालीन तकनीकी इतिहास की एक अमूल्य धरोहर है. इस पुल के छोर पर लगाया गया चेतावनी बोर्ड और भारी वाहनों का प्रतिबंध इस धरोहर को बचाए रखने के लिए बेहद जरूरी है. उनके मुताबिक शहरवासियों और पर्यटकों को भी सतर्कता बरतते हुए इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण में अपना महत्वपूर्ण सहयोग देना चाहिए जिससे यह प्राचीन पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे



